रुद्राभिषेक शब्द का अर्थ :- अभिषेक शब्द का शाब्दिक अर्थ अगर हम जानें तो इसका अर्थ होता है 'स्नान कराना'। इसलिए रुद्राभिषेक का अर्थ हुआ भगवान शिव का अभिषेक करना या उनको स्नान कराना। भोलेनाथ या शिवलिंग पर रुद्र के पवित्र मंत्रों के जाप के साथ उनका अभिषेक किया जाता है ।यह पवित्र-स्नान रुद्ररूप शिव को कराया जाता है। वर्तमान समय में अभिषेक रुद्राभिषेक के रूप में ही विश्रुत है। अभिषेक के कई रूप तथा प्रकार होते हैं। शिवजी को प्रसंन्न करने का सबसे श्रेष्ठ तरीका है रुद्राभिषेक करना अथवा श्रेष्ठ ब्राह्मण विद्वानों के द्वारा कराना। अपनी जटा में गंगा को धारण करने से भगवान शिव को जलधाराप्रिय माना गया है। रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: अर्थात रुद्र रूप में प्रतिष्ठित शिव हमारे सभी दु:खों को शीघ्र ही समाप्त कर देते हैं। यानी रुद्राभिषेक करने पर हमारे दुखों का अंत होता है। वस्तुतः जो दुःख हम भोगते हैं उसका कारण हम सब स्वयं ही हैं। हमारे द्वारा जाने अनजाने में किये गए प्रकृति विरुद्ध आचरण के परिणामस्वरूप ही हम दुःख भोगते हैं।

 

रुद्राभिषेक का इतिहास :- प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी जब अपने जन्म का कारण जानने के लिए भगवान विष्णु के पास पहुंचे तो उन्होंने ब्रह्मा की उत्पत्ति का रहस्य बताया और यह भी कहा कि मेरे कारण ही आपकी उत्पत्ति हुई है। परन्तु ब्रह्माजी यह मानने के लिए तैयार नहीं हुए और दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध से नाराज भगवान रुद्र लिंग रूप में प्रकट हुए। इस लिंग का आदि अन्त जब ब्रह्मा और विष्णु को कहीं पता नहीं चला तो हार मान ली और लिंग का अभिषेक किया, जिससे भगवान प्रसन्न हुए। कहा जाता है कि यहीं से रुद्राभिषेक का आरम्भ हुआ। वेदों और पुराणों में रुद्राभिषेक के बारे में कहा गया है कि रावण ने अपने दसों सिरों को काटकर उसके रक्त से शिवलिंग का अभिषेक किया था तथा सिरों को हवन की अग्नि को अर्पित कर दिया था जिससे वो त्रिलोकजयी हो गया। भस्मासुर ने शिवलिंग का अभिषेक अपनी आंखों के आंसुओं से किया तो वह भी भगवान के वरदान का पात्र बन गया।

 

रुद्राभिषेक का महत्त्व :-  धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सभी देवताओं की आत्मा में भगवान सदाशिव रुद्र विराजमान हैं. इनकी पूजा करने से सभी देवों की पूजा हो जाती है. भगवान भोलेनाथ महाकाल हैं, उनकी पूजा से अकाल मृत्यु का संकट भी दूर हो जाता है. भगवान शिव के रुद्राभिषेक से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है साथ ही ग्रह दोष भी दूर होते हैं. भगवान शिव के षडाक्षरी मंत्र– ॐ नम:शिवाय का जप करते हुए रुद्राभिषेक करने से इसका पूर्ण लाभ मिलता है. रूद्राभिषेक करने से परिवार में सुख-शांति और सफलता आती है. रुद्राभिषेक में भगवान शिव का दूध से अभिषेक करने का विशेष महत्व है।

 

रुद्राभिषेक पूजा विधि :- भगवान के रुद्राभिषेक के लिए शुद्ध जल में गंगाजल, भांग, दूध, गन्ने का रस आदि मिला लें | 

 

  • रुद्राभिषेक के दौरान आचार्य रुद्री का पाठ करते है | 
  • अब आप श्रृंगी के द्वारा धीरे शिवलिंग पर जल चढ़ाएं | 
  • जल चढाने के दौरान आप रुद्रास्टाध्यायी का पाठ करें या फिर ॐ नमः शिवायः का जाप करें | 
  • रुद्राभिषेक पूरा होने के बाद सभी एकत्रित भक्तजन भगवान शिव की आरती गायें | 
  • रुद्राभिषेक के जल को पुरे घर में छिड़कें | 
  • भगवान शिव को शुद्धता से घर में बनाएं व्यंजनों का भोग लगाएं | 
  •  
  • यदि रुद्राभिषेक पूजा मंदिर में कर रहे है तो आपको जहाँ शिवलिंग है वहीँ पर पूजा करनी है | यदि आप घर में रुद्राभिषेक करना चाह रहे है तो फिर आपको उत्तर दिशा में शिवलिंग की स्थापना करनी चाहिए और पूर्वाभिमुख होकर पूजा करनी चाहिए | 
  • शिवलिंग के साथ ही गणेश जी, अन्य देवता एवं नवग्रह के पूजन के लिए भी पूर्व की दिशा में एक चौकी पर सभी को स्थान देना चाहिए |
  • रुद्राभिषेक के दिन सभी परिवारजन को स्नान ध्यान कर पूजा के लिए सही समय पर पहुंचना चाहिए | 
  • घर को आशा पाला के पत्तों एवं फूलमालाओं से सुसज्जित करना चाहिए |  
  • रुद्राभिषेक शुरू होने से पहले ही पूजन सामग्री एवं अन्य तरह की तैयारी कर लेनी चाहिए | 
  • रुद्राभिषेक पूजन में बहुत से मंत्रो का उच्चारण होता है इसलिए इसके लिए अनुभवी पंडित द्वारा यह पूजा करवानी चाहिए|
  • रुद्राभिषेक पूजा में शिवलिंग पर जलाभिषेक शुरू करने से पहले भगवान गणेश जी का पूजन करें | भगवान गणेश को तिलक, चावल, फूल, नैवेद्य, दूर्वा और दक्षिणा अर्पित करें | 
  • अन्य आह्वान किये गए देवताओं और नवग्रह की पूजा करें | 
  • अब भगवान शंकर की पूजा करें | उन्हें तिलक आदि लगाएं | 
  • बिल्वपत्र पर चन्दन से ॐ बनाकर भगवान शिव को अर्पित करें | 
  • अब सभी परिवारजन खड़े होकर आरती करें |

 

रुद्राभिषेक पूजा के फायदे :-  रुद्राभिषेक पूजा से घर से नकारात्मकता दूर होती है और घर में सकारात्मक वातावरण बनता है | रुद्राभिषेक करने से इस जन्म के साथ पिछले जन्म के भी पातक पाप नष्ट हो जाते है और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है | भगवान रूद्र में सभी देवताओं का वास होता है  इसलिए जब हम रुद्राभिषेक करते है तो सभी देवता प्रसन्न होते है | किसी व्यक्ति के यदि कालसर्प योग लगा हो तो उसे शिव रुद्राभिषेक करना चाहिए इससे कालसर्प योग का प्रभाव दूर होता है | यदि श्रावण के महीने में रुद्राभिषेक करते है तो यह अति फलदायी होता है | 

रुद्राभिषेक को लेकर ऐसी मान्‍यता है कि हमारी कुंडली के महापाप भी जलकर भस्म हो जाते हैं और हम में शिवत्व का उदय होता है, भगवान शिव का शुभाशीर्वाद प्राप्त होता है। सभी मनोरथ पूर्ण करने के लिए एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवता स्‍वत: ही प्रसन्‍न हो जाते हैं। सावन में रुद्राभिषेक करने के इतने होते हैं लाभ। कृष्णपक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी तथा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, पूर्णिमा में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं। अतएव इन तिथियों में किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर उनकी साधना भंग होती है जिससे अभिषेककर्ता पर विपत्ति आ सकती है। भगवान शंकर के रुद्राभिषेक की महिमा लगभग सभी धार्मिक ग्रंथों में बताई गई है. कहते हैं कि रुद्राभिषेक करने से आपकी एक-दो नहीं, बल्कि 18-18 कमानाएं पूरी हो जाती हैं. दिन सोमवार का हो, प्रदोष का हो, शिवरात्रि का हो या फिर सावन का, शिव की सभी मान्य तिथियों में शिव का रुद्राभिषेक जन्म जन्मांतर के पापों को काट कर मोक्ष का रास्ता खोल देता है. रुद्राभिषेक यूं तो कभी भी किया जाए यह बड़ा ही शुभ फलदायी माना गया है रुद्राभिषेक में भगवान शिव का पवित्र स्नान कराकर पूजा अर्चना की जाती है | शिवपुराण के रुद्र संहिता में सावन मास में रुद्राभिषेक का विशेष महत्व बताया गया है. रुद्राभिषेक का फल भगवान शंकर प्रसन्न होकर तत्काल देते हैं | 

 

निष्कर्ष :- रुद्राभिषेक की शक्ति इतनी अधिक होती है कि जिस क्षेत्र में भी किया जाता है, उससे कई किलोमीटर तक के हिस्से में शुद्धता आ जाती है और वहां की नकारात्मकता का अंत होता है रुद्राभिषेक का फल भगवान शंकर प्रसन्न होकर तत्काल देते हैं. अंतत रुद्राभिषेक मंगलकारी है |

 

 

 

 

“रुद्राभिषेक पूजन”

सामग्री विवरण

पूजन सामग्री :-

‘सामग्री’  

 ‘मात्रा’

रोली

10 ग्राम

पीला सिंदूर

10 ग्राम

पीला अष्टगंध चंदन

10 ग्राम

लाल चन्दन

10 ग्राम

सफेद चंदन

10 ग्राम

लाल सिंदूर

10 ग्राम

हल्दी (पिसी)

50 ग्राम

हल्दी (समूची)

50 ग्राम

सुपाड़ी (समूची बड़ी)

100 ग्राम

लौंग

10 ग्राम

इलायची

10 ग्राम

 सर्वौषधि

1 डिब्बी

सप्तमृत्तिका

1 डिब्बी

सप्तधान्य

100 ग्राम

पीली सरसों

50 ग्राम

गुर्च

100 ग्राम

जनेऊ

5 पीस

इत्र बड़ी

1 शीशी

गरी का गोला (सूखा)

1 पीस

पानी वाला नारियल

1 पीस

अक्षत (चावल)

1 किलो

धूपबत्ती

1 पैकेट

रुई की बत्ती (गोल / लंबी)

1-1 पै.

देशी घी

500 ग्राम

सरसों का तेल

500 ग्राम

चमेली का तेल

1 शीशी

कपूर

20 ग्राम

कलावा

5 पीस

चुनरी (लाल / पीली)

1/1 पीस

बताशा

500 ग्राम

रंग लाल

5 ग्राम

रंग पीला

5 ग्राम

रंग काला

5 ग्राम

रंग नारंगी

5 ग्राम

रंग हरा

5 ग्राम

रंग बैंगनी

5 ग्राम

अबीर गुलाल (लाल, पीला, हरा, गुलाबी) अलग-अलग

10 ग्राम

बुक्का (अभ्रक)

10 ग्राम

भस्म

100 ग्राम

गंगाजल

1 शीशी

गुलाब जल

1 शीशी

केवड़ा जल

1 शीशी

लाल वस्त्र

1 मी.

पीला वस्त्र

1 मी.

सफेद वस्त्र

1 मी.

हरा वस्त्र

1 मी.

नीला वस्त्र

1 मी.

झंडा हनुमान जी का

1 पीस

चांदी का सिक्का

1 पीस

कुश (पवित्री)

4 पीस

लकड़ी की चौकी

1 पीस

रुद्राक्ष की माला

1 पीस

दोना (छोटा – बड़ा)

1-1 पीस

मिट्टी का कलश (बड़ा)

1 पीस

मिट्टी का प्याला

11 पीस

मिट्टी की दियाली

11 पीस

माचिस

1 पैकेट

तिल

100 ग्राम

जौ

100 ग्राम

गुड़

500 ग्राम

कमलगट्टा

100 ग्राम

शहद

50 ग्राम

पंचमेवा

200 ग्राम

केसर

1 डिब्बी

पंचरत्न व पंचधातु

1 डिब्बी

नाग नागिन चांदी के

1 पीस

धोती पीली/लाल

1 पीस

अंगोछा पीला/लाल

1 पीस

सुहाग सामग्री – साड़ी, बिंदी, सिंदूर, चूड़ी, आलता, नाक की कील, पायल, इत्यादि

 

                        तत्काल लेने का सामान

    ‘सामग्री’   

 ‘मात्रा’

मिष्ठान

500 ग्राम

पान के पत्ते (समूचे)

21 पीस

आम के पत्ते

2 डंठल

ऋतु फल

5 प्रकार के

दूब घास

100 ग्राम

बेल पत्र

108 पीस

बेल फल

5 पीस

मदार के पत्ते

108 पीस

मदार के फूल

200 ग्राम

भांग

200 ग्राम

भांग का गोला

2 पीस

धतूरा (फूल व फल)

 200 ग्राम      7 पीस

शमी की पत्ती

10 ग्राम

गन्ना

1 पीस

कमल का फूल

11 पीस

फूल, हार लड़ी (गुलाब) की

7 मी.

फूल, हार लड़ी (गेंदे) की

7 मी.

गेंदा का खुला हुआ फूल

1 किलो

गुलाब का खुला हुआ फूल

1 किलो

चाँदनी का खुला हुआ फूल

1 किलो

नवरंग का खुला हुआ फूल

1 किलो

सूरजमुखी के फूल (सफ़ेद/पीला)

 1 किलो

तुलसी मंजरी

10 ग्राम

गन्ने का रस

1 लीटर

दूध

7 लीटर

दही

 1 किलो

 

                          देव चित्र (प्रतिमा-मूर्ति)

(प्रतिमा – मूर्ति)

 ‘मात्रा’

मूर्ति बनाने के लिए मिट्टी :-     7 किलो

(गीली वाली)

7 किलो

शिव शंकर भगवान की प्रतिमा :-   1 पीस

1 पीस

 

                        घर से लेने वाला सामान

 ‘सामग्री’       

 ‘मात्रा’

आटा

100 ग्राम

चीनी

500 ग्राम

अखंड दीपक (ढक्कन समेत)

1 पीस

तांबे/पीतल का कलश (ढक्कन समेत)

1 पीस

थाली

7 पीस

लोटे

2 पीस

गिलास

7 पीस

कटोरी

4 पीस

चम्मच

2 पीस

परात

4 पीस

कैची/चाकू (लड़ी काटने हेतु)

1 पीस

टोकरी (फल-फूल रखने हेतु)

4 पीस

बाल्टी (दूध व जल के लिए)

2 पीस

परात बड़ी (अभिषेक हेतु)

1 पीस

हनुमंत ध्वजा हेतु बांस (छोटा/ बड़ा)

1 पीस

      जल (पूजन हेतु)

      गाय का गोबर

      बिछाने का आसन

 

                 यजमान की गांठ बांधने हेतु सामग्री

चुनरी

 1 पीस

अंगोछा

 1 पीस

पूजा में रखने हेतु सिंदौरा

 1 पीस

 

                   घर में प्रसाद बनाने हेतु :- पंचामृत

               ब्राह्मणो के लिए वरण सामग्री

धोती,

कुर्ता,

अंगोछा,

पंच पात्र,

माला इत्यादि