वैदिक शिक्षा का परिचय :- भारत की पहली शिक्षा प्रणाली वैदिक शिक्षा प्रणाली थी, जहाँ उच्च जाति के ब्राह्मण और क्षत्रिय बच्चों को गुरुकुल में उनके जीवन के दौरान वेदों की शिक्षा दी जाती थी।वैदिक काल में आज की व्यावसायिक शिक्षा को कर्म शिक्षा कहा जाता था। वैदिक शिक्षा के दौरान चार वेदों, अर्थात् ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद का अध्ययन किया जाता था। अंग्रेजों के भारत आने से पहले देश में वैदिक शिक्षा ही शिक्षा का माध्यम थी। लेकिन औद्योगिक युग की शिक्षा के प्रचलन के कारण वैदिक शिक्षा प्रणाली अपना महत्व खोने लगी। फिर भी, आज के समय में लोगों की रुचि वैदिक शिक्षा में फिर से बढ़ने लगी है। वैदिक शिक्षा, जैसा कि अधिकांश लोग समझते हैं, धार्मिक शिक्षा का रूप नहीं है। गुरुकुल के समय में छात्रों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी, तथा गुरु (शिक्षक) और शिष्य (छात्र) एक ही स्थान (गुरुकुल) में रहते थे। वैदिक शिक्षा प्रणाली वैदिक ग्रंथों की समझ पर केंद्रित थी, तथा यह धार्मिक तटस्थता की ओर अधिक इशारा करती थी। इसके अलावा, इसने छात्रों के बीच स्वतंत्रता का अभ्यास किया। नीचे वैदिक शिक्षा की कुछ विशेषताएं दी गई हैं जो इसे 21वीं सदी में भी प्रासंगिक बनाती हैंl
वैदिक शिक्षा की विशेषताएँ :-
· वैदिक शिक्षा की मुख्य विशेषताएं हैं:-
1. वेदों का अध्ययन वैदिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य था। इस प्रकार, ऋग्वेद वैदिक शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
2. विद्यार्थी अपना अधिकांश समय स्वाध्याय, चिंतन और मनन में बिताते हैं। सांसारिक सामग्री से अधिक ज्ञान और बौद्धिकता का महत्व है।
3. वैदिक शिक्षा में धर्म की अहम भूमिका होती है। हर विद्यार्थी को धर्म का कोर्स करना चाहिए। इसलिए वैदिक शिक्षा धर्म को महत्व देती है।
4. वैदिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करना था।
5. गुरुकुलों और आश्रमों में शिक्षक विद्यार्थियों को शिक्षा देते हैं। विद्यार्थी और शिक्षक सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धांत का पालन करते हैं।
6. शिक्षा ने ब्रह्मचर्य का पालन, इन्द्रिय संयम और जीवन की पवित्रता में मदद की।
7. शिक्षण की पद्धति मनोवैज्ञानिक थी l
8. विद्यार्थी चिंतन और मनन में व्यस्त रहते हैं। इससे उनमें मौलिकता का विकास होता है।
वैदिक साहित्य बौद्ध जैन साहित्य से तात्पर्य उस विपुल साहित्य से है जिसमें वेदसंहिता, ब्राह्मण-ग्रन्थ, आरण्यक एवं उपनिषद् शामिल हैं। वर्तमान समय में वैदिक साहित्य ही हिन्दू धर्म के प्राचीनतम स्वरूप पर प्रकाश डालने वाला तथा विश्व का प्राचीनतम् स्रोत है।
वैदिक शिक्षा के आधार :-
ऋग्वेद :- ऋग्वेद में 10,627 मन्त्र और 1,028 सूक्त हैं, ये दस मण्डलों में विभक्त हैं। सूक्तों में देवताओं की स्तुतियाँ हैं। ये बड़ी भव्य, उदात्त और काव्यमयी हैं। इनमें कल्पना की नवीनता, वर्णन की प्रौढ़ता और प्रतिभा की ऊँची उड़ान मिलती है। ‘उषा’ आदि कई देवताओं के वर्णन बड़े हृदयग्राही हैं। पाश्चात्य विद्वान ऋग्वेद की संहिता को सबसे प्राचीन मानते हैं। उनका विचार है कि इसके अधिकांश सूक्तों की रचना पंजाब में हुई।
यजुर्वेद :- इसमें यज्ञ-विषयक मन्त्रों का संग्रह है। इनका प्रयोग यज्ञ के समय अध्वर्यु नामक पुरोहित किया करता था। यजुर्वेद में 40 अध्याय हैं। तथा 1975 मन्त्र निहित है। पाश्चात्य विद्वान इसे ऋग्वेद से काफी समय बाद का मानते हैं। ऋग्वेद में आर्यों का कार्य-क्षेत्र पंजाब है, इसमें कुरु-पांचाल। कुरु सतलुज यमुना का मध्यवर्ती भू-भाग (वर्तमान अम्बाला डिवीज़न) है और पांचाल गंगा-यमुना का दोआब था। इसी समय से गंगा-यमुना का प्रदेश आर्य-सभ्यता का केन्द्र हो गया। ऋग्वेद का धर्म उपासना-प्रधान था, किन्तु यजुर्वेद के दो भेद हैं-कृष्ण यजुष् और शुक्ल यजुष्। दोनों के स्वरूप में बड़ा अन्तर है, पहले में केवल मन्त्रों का संग्रह है और दूसरे में छन्दोबद्ध मन्त्रों के साथ गद्यात्मक भाग सभी है।
सामवेद :- इसमें गेय मन्त्रों का संग्रह है। यज्ञ के अवसर पर जिस देवता के लिए होम किया जाता था, उसे बुलाने के लिए उद्गाता उचित स्वर में उस देवता का स्तुति-मन्त्र गाता था। इस गायन को ‘साम’ कहते थे। प्रायः ऋचाएँ ही गाई जाती थीं। अतः समस्त सामवेद में ऋचाएँ ही हैं। इनकी संख्या 1,875 है। इनमें से केवल 75 ही नई हैं, बाकी सब ऋग्वेद से ली गईं हैं। भारतीय संगीत का मूल सामवेद में उपलब्ध होता है।
अथर्ववेद :- अथर्ववेद का यज्ञों से बहुत कम सम्बन्ध है। इसमें आयुर्वेद सम्बन्धी सामग्री अधिक है। इसका प्रतिपाद्य विषय विभिन्न प्रकार की ओषधियाँ, ज्वर, पीलिया, सर्पदंश, विष-प्रभाव को दूर करने के मन्त्र सूर्य की स्वास्थ्य-शक्ति, रोगोत्पादक कीटाणुओ के शमन अदि का वर्णन है , इस वेद में यज्ञ करने के लाभ को तथा यज्ञ से पर्यावरण की रक्षा का भी वर्णन है। वे इसमें आर्य और अनार्य धार्मिक विचारों का सम्मिश्रण देखते हैं, किन्तु वस्तुतः इसमें राजनीति तथा समाज-शास्त्र के अनेक ऊँचे सिद्धान्त हैं। इसमें 20 काण्ड, 34 प्रपाठक, 111 अनुवाक, 731 सूक्त तथा 5,977 मन्त्र हैं, इनमें 1200 के लगभग मन्त्र ऋग्वेद से लिए गए हैं। ऊपर कहे गए चारों संहिताएं पहले एक ही जगह थे। वेदव्यास जी ने यज्ञसिद्धिके लिए चार भागों में विभाजन किया था।
उपनिषद् :- उपनिषद् हिन्दू धर्म के महत्त्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रन्थ हैं। ये वैदिक वाङ्मय के अभिन्न भाग हैं। ये संस्कृत में लिखे गये हैं। इनकी संख्या लगभग १०८ है, किन्तु मुख्य उपनिषद १३ हैं। हर एक उपनिषद किसी न किसी वेद से जुड़ा हुआ है। इनमें परमेश्वर, परमात्मा-ब्रह्म और आत्मा के स्वभाव और सम्बन्ध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक वर्णन दिया गया है। उपनिषद् भारतीय सभ्यता की अमूल्य धरोहर है। उपनिषद ही समस्त भारतीय दर्शनों के मूल स्रोत हैं, चाहे वो वेदान्त हो या सांख्य। उपनिषदों को स्वयं भी 'वेदान्त' कहा गया है। उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन के मूल आधार हैं, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के स्रोत हैं। वे ब्रह्मविद्या हैं। जिज्ञासाओं के ऋषियों द्वारा खोजे हुए उत्तर हैं। वे चिन्तनशील ऋषियों की ज्ञानचर्चाओं का सार हैं। वे कवि-हृदय ऋषियों की काव्यमय आध्यात्मिक रचनाएँ हैं, अज्ञात की खोज के प्रयास हैं, वर्णनातीत परमशक्ति को शब्दों में प्रस्तुत करनेकि की कोशिशें हैं और उस निराकार, निर्विकार, असीम, अपार को अन्तरदृष्टि से समझने और परिभाषित करने की अदम्य आकांक्षा के लेखबद्ध विवरण हैं।
वर्तमान समय में २०० से अधिक ग्रन्थ हैं जिन्हे 'उपनिषद' नाम से अभिहित किया जाता है। मुक्तिका उपनिषद् में १०८ उपनिषदों की सूची दी गयी है जिसमें मुक्तिका उपनिषद स्वयं १०८वें स्थान पर है। उपनिषदों को अनेक प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है।
किसी उपनिषद का सम्बन्ध किस वेद से है, इस आधार पर उपनिषदों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जाता है-
(१) ऋग्वेदीय -- 10 उपनिषद्
(२) शुक्ल यजुर्वेदीय -- 19 उपनिषद्
(३) कृष्ण यजुर्वेदीय -- 32 उपनिषद्
(४) सामवेदीय -- 16 उपनिषद्
(५) अथर्ववेदीय -- 31 उपनिषद्
कुल -- 108 उपनिषद्
इनके अतिरिक्त नारायण, नृसिंह, रामतापनी तथा गोपाल चार उपनिषद् और हैं।
उपनिषदों में मुख्य रूप से 'आत्मविद्या' का प्रतिपादन है, जिसके अन्तर्गत ब्रह्म और आत्मा के स्वरूप, उसकी प्राप्ति के साधन और आवश्यकता की समीक्षा की गयी है। आत्मज्ञानी के स्वरूप, मोक्ष के स्वरूप आदि अवान्तर विषयों के साथ ही विद्या, अविद्या, श्रेयस, प्रेयस, आचार्य आदि तत्सम्बद्ध विषयों पर भी भरपूर चिन्तन उपनिषदों में उपलब्ध होता है। वैदिक ग्रन्थों में जो दार्शनिक और आध्यात्मिक चिन्तन यत्र-तत्र दिखाई देता है, वही परिपक्व रूप में उपनिषदों में निबद्ध हुआ है।
उपनिषदों में सर्वत्र समन्वय की भावना है। दोनों पक्षों में जो ग्राह्य है, उसे ले लेना चाहिए। दृष्टि से ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग, विद्या और अविद्या, संभूति और असंभूति के समन्वय का उपदेश है। उपनिषदों में कभी-कभी ब्रह्मविद्या की तुलना में कर्मकाण्ड को बहुत हीन बताया गया है। ईश आदि कई उपनिषदें एकात्मवाद का प्रबल समर्थन करती हैं।
उपनिषद् ब्रह्मविद्या का द्योतक है। कहते हैं इस विद्या के अभ्यास से मुमुक्षुजन की अविद्या नष्ट हो जाती है (विवरण); वह ब्रह्म की प्राप्ति करा देती है (गति); जिससे मनुष्यों के गर्भवास आदि सांसारिक दुःख सर्वथा शिथिल हो जाते हैं (अवसादन)। फलतः उपनिषद् वे ‘तत्त्व’ प्रतिपादक ग्रन्थ माने जाते हैं जिनके अभ्यास से मनुष्य को ब्रह्म अथवा परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
ग्रंथ :- ग्रंथ का अर्थ होता है गूंथना या बांधना । जिसमें ज्ञान को गूंथ या बांध दिया जाए उसे ग्रन्थ कहते हैं । सामान्य व्यवहार में बड़े पुस्तकों को ग्रन्थ कह दिया जाता है । ये कितने प्रकार के हैं यह कहना अति दुष्कर है । क्योंकि ज्ञान अनन्त है ,और उसकी अनेक शाखाएं हैं । जैसे धार्मिक , सामाजिक , राजनैतिक ,ऐतिहासिक ,भौगोलिक , खगोलीय , गणितीय ,रासायनिक ,आयुर्वैदिक ,पौराणिक , व्याकरणिक ,साहित्यिक , आर्थिक, कृषि सम्बन्धी , पशुपालन सम्बन्धी आदि । इन्ही में से एक प्राचीन ग्रंथ है महाभारत l
महाभारत :- महाभारत भारत का एक प्रमुख काव्य ग्रंथ है, जो स्मृति के इतिहास वर्ग में आता है। इसे भारत भी कहा जाता है। यह काव्यग्रंथ भारत का अनुपम धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रंथ हैं। विश्व का सबसे लंबा यह साहित्यिक ग्रंथ और महाकाव्य, हिन्दू धर्म के मुख्यतम ग्रंथों में से एक है। द्वापर युग धर्म की रक्षा के लिए महाभारत का युद्ध लड़ा गया था। कुरुक्षेत्र में लड़े जाने के कारण इसे कुरुक्षेत्र का युद्ध भी कहा जाता है। इस युद्ध की सबसे विशेष बात यह थी कि इसमें भगवान श्री कृष्ण स्वयं अर्जुन के सारथी बने थे। यह भयावह युद्ध कुल 18 दिनों तक चला। महाभारत एक केंद्रीय वीर कथा के इर्द-गिर्द व्यवस्थित पौराणिक और उपदेशात्मक सामग्री का एक समूह है जो दो चचेरे भाइयों, कौरवों (देवताओं के पुत्र) के बीच संप्रभुता के संघर्ष के बारे में बताता है। धृतराष्ट्र, कुरु के वंशज) और पांडव (पांडु के पुत्र)। महाभारत हमें यह शिक्षा देता है कि बुराई के विरुद्ध अच्छाई की हमेशा जीत होती है। महाभारत का नैतिक पाठ सही और सत्यनिष्ठ तरीके से जीना है। हमें हमेशा अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए, जैसे पांडवों ने उन अधिकारों और विशेषाधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी थी, जिन्हें कौरवों ने झूठे तरीकों से उनसे छीन लिया था।
महाकाव्य (रामायण) :- रामायण हिंदुओं का प्रमुख ग्रन्थ है। रामायण बताती है कि कुछ गुणों को अपनाकर और कुछ खास बातों का ध्यान में रखकर मर्यादा एवं अनुशासन वाला जीवन जीना चाहिए। इससे बुराई पर अच्छाई की जीत होती है। रामायण एक राजपरिवार और राजवंश की कहानी है जो पति-पत्नी, भाई और परिवार के अन्य सदस्यों के आपसी रिश्तों के आदर्श पेश करती है। रामायण से हर इंसान को कुछ न कुछ सीखकर अपने जीवन में अच्छी बातें शामिल करनी चाहिए। इससे जीवन का स्तर बढ़ेगा। वहीं अच्छे गुणों के प्रभाव से हर कामों सफलता मिलेगी। मानसिक तनाव से बचेंगे और परेशानियों से भी दूर रहेंगे।
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