गुरुकुल

 

गुरुकुल का शाब्दिक अर्थ  :-   'गुरुकुल' का शाब्दिक अर्थ है 'गुरु का परिवार' अथवा 'गुरु का वंश'। गुरुकुल भारत में सदियों से चली आ रही एक पारंपरिक शिक्षण पद्धति है। " गुरु का घर ", और यह एक प्रकार के विद्यालय को संदर्भित करता है जहाँ छात्र आवासीय परिवेश में अपने शिक्षक के साथ रहते हैं और अध्ययन करते हैं।

 

प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था  :-    भारत के प्राचीन इतिहास में ऐसे विद्यालयों का बहुत महत्व था। प्रसिद्ध आचार्यों के गुरुकुल में पढ़े हुए छात्रों का सब जगह बहुत सम्मान होता था।  राम  ने  ऋषि वशिष्ठ के यहाँ रह कर शिक्षा प्राप्त की थी। इसी प्रकार पाण्डवों ने ऋषि द्रोण के यहाँ रह कर शिक्षा प्राप्त की थी।

 

भारतवर्ष के गुरुकुल आश्रमों के आचार्यों को उपाध्याय और प्रधान आचार्य को 'कुलपति' या 'महोपाध्याय' कहा जाता था । रामायण काल में वशिष्ठ का बृहद् आश्रम था जहाँ राजा दिलीप तपश्चर्या करने गये थे, जहाँ विश्वामित्र को ब्रह्मत्व प्राप्त हुआ था। इस प्रकार का एक और प्रसिद्ध आश्रम प्रयाग में भारद्वाज मुनि का था। गुरुकुलों के ही विकसित रूप  तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला  और वलभी के विश्वविद्यालय थे। जातकों, ह्वेनसांग के यात्राविवरण तथा अन्य अनेक संदर्भों से ज्ञात होता है कि उन विश्वविद्यालयों में दूर-दूर से विद्यार्थी वहाँ के विश्वविख्यात अध्यापकों से पढ़ने आते थे। वाराणसी अत्यन्त प्राचीन काल से शिक्षा का मुख्य केन्द्र थी और अभी हाल तक उसमें सैकड़ों गुरुकुल, पाठशालाएँ रही हैं और उनके भरण पोषण के लिए अन्नक्षेत्र चलते रहे। यही अवस्था  बंगाल और नासिक तथा दक्षिण भारत के अनेक नगरों में रही। 19वीं शताब्दी में प्रारंभ होने वाले भारतीय राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के युग में प्राचीन गुरुकुलों की परम्परा पर अनेक गुरुकुल स्थापित किए गए और राष्ट्रभावना के प्रसार में उनका महत्वपूर्ण योग रहा। यद्यपि आधुनिक अवस्थाओं में प्राचीन गुरुकुलों की व्यवस्था को यथावत पुन: प्रतिष्ठित तो नहीं किया जा सकता, तथापि उनके आदर्शों को यथावश्यक परिवर्तन के साथ अवश्य अपनाया जा सकता है।

 

गुरुकुलों के इतिहास में भारत की शिक्षाव्यवस्था और ज्ञानविज्ञान की रक्षा का इतिहास समाहित है। भारतीय संस्कृति के विकास में चार पुरुषार्थों, चार वर्णों और चार आश्रमों की मान्यताएँ तो अपने उद्देश्यों की सिद्धि के लिए अन्योन्याश्रित थी ही, गुरुकुल भी उनकी सफलता में बहुत बड़े साधक थे। यज्ञ और संस्कारों द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य और शूद्र सभी कुल, वर्ण और समाज के बालक 6, 8 अथवा 11 वर्ष की अवस्थाओं में गुरुकुलों में ले जाए जाते थे (यज्ञोपवीत, उपनयन अथवा उपवीत) और गुरु के पास बैठकर ब्रह्मचारी के रूप में शिक्षा प्राप्त करते थे। गुरु उनके मानस और बौद्धिक संस्कारों को पूर्ण करता हुआ उन्हें सभी शास्त्रों एवं उपयोगी विद्याओं की शिक्षा देता तथ अंत में दीक्षा देकर उन्हें  विवाह कर गृहस्थाश्रम के विविध कर्तव्यों का पालन करने के लिए वापस भेजता। यह दीक्षित और समावर्तित स्नातक ही पूर्ण नागरिक होता और समाज के विभिन्न उत्तरदायित्वों का वहन करता हुआ त्रिवर्ग की प्राप्ति का उपाय करता। स्पष्ट है, भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विकास में गुरुकुलों का महत्वपूर्ण योग था। प्राचीन भारतीय गुरुकुलों में कुलपति हुआ करते थे। कालिदास ने वशिष्ठ तथा कण्व ऋषि को (रघुवंश, प्रथम, 95 तथा अभिज्ञान शाकुन्तलम्, प्रथम अंक) कुलपति की संज्ञा दी है। गुप्तकाल में संस्थापित तथा हर्षवर्धन के समय में अपनी चरमोन्नति को प्राप्त होने वाले नालन्दा महाविहार नामक विश्वविद्यालय के कुछ प्रसिद्ध तथा विद्वान कुलपतियों के नाम ह्वेन्सांग के यात्राविवरण से ज्ञात होता हैं। बौद्ध भिक्षु धर्मपाल तथा शीलभद्र उनमें प्रमुख थे।

 

प्राचीन भारत के गुरुकुलों के अंतर्गत तीन प्रकार की शिक्षा संस्थाएँ थीं-

  • (1) गुरुकुल - जहाँ विद्यार्थी आश्रम में गुरु के साथ रहकर विद्याध्ययन करते थे,
  • (2) परिषद  - जहाँ विशेषज्ञों द्वारा शिक्षा दी जाती थी,
  • (3) तपस्थली - जहाँ बड़े-बड़े सम्मेलन होते थे और सभाओं तथा प्रवचनों से ज्ञान अर्जन होता था। नैमिषारण्य ऐसा ही एक स्थान था।

 

1983 में भारत पर ब्रिटिश आक्रमण के बाद, लॉर्ड मैकाले जिन्हें उस समय भारत का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया था, को भारत में मौजूद शिक्षा प्रणाली में सुधार करने के लिए जाना जाता है। उन्होंने “देशी और सांस्कृतिक शिक्षा प्रणाली” को ध्वस्त कर दिया था और इसकी जगह “आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली” को लागू किया था।

 

भारत में अंग्रेजी को अनिवार्य भाषा बनाने के उद्देश्य से उन्होंने अंग्रेजी भाषा को अनिवार्य बना दिया और गुरुकुलों में संस्कृत के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया। अंततः गुरुकुल की शिक्षा प्रणाली पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उन्हें मिलने वाली सामाजिक सहायता और सहयोग भी अवैध बना दिया गया। गुरुकुलों को ध्वस्त कर दिया गया और उनमें आग भी लगा दी गई।

 

उस समय के कई गुरुओं को या तो जेल में डाल दिया गया या मार दिया गया। गुरुकुलों पर प्रतिबंध लगा दिया गया और कॉन्वेंट स्कूलों की अवधारणा को बढ़ावा दिया गया, जिसे तब 'फ्री स्कूल' कहा जाता था। जल्द ही, गुरुकुल शिक्षा प्रणाली गायब हो गई और आधुनिक शिक्षण प्रणाली को अपनाया गया। लेकिन वर्तमान समय में भी भारत मे कई जगह आज भी गुरुकुल प्रणाली है और अनुकूल रूप से कार्यरत है l

 

परिचय  :-   गुरुकुल से आशय ऐसे विद्यालय से है जहाँ विद्यार्थी अपने परिवार से दूर गुरु के परिवार का हिस्सा बनकर शिक्षा प्राप्त करता है। प्राचीन भारत में गुरुकुल ही अध्ययन-अध्यापन के प्रधान केंद्र हुआ करते थे। दूर-दूर से ब्रह्मचारी विद्यार्थी, अथवा सत्यान्वेषी परिव्राजक अपनी अपनी शिक्षाओं को पूर्ण करने जाते थे। वे गुरुकुल छोटे अथवा बड़े सभी प्रकार के होते थे। गुरुकुल प्रायः ब्राह्मण गृहस्थों द्वारा गाँवों अथवा नगरों के भीतर तथा बाहर दोनों ही स्थानों में चलाए जाते थे। गृहस्थ विद्वान और कभी कभी वानप्रस्थी भी दूर-दूर से शिक्षार्थियों को आकृष्ट करते और अपने परिवार में और अपने साथ रखकर अनेक वर्षों तक (आदर्श और विधान पच्चीस वर्षों तक का था) उन्हें शिक्षा देते। पुरस्कार स्वरुप ब्रह्मचारी बालक या तो अपनी सेवाएँ गुरू और उसके परिवार को अर्पित करता या संपन्न होने की अवस्था में अर्थशुल्क ही दे देता। परंतु ऐसे आर्थिक पुरस्कार और अन्य वस्तुओं वाले उपहार दीक्षा के बाद ही दक्षिणास्वरूप दिए जाते और गुरु विद्यादान प्रारम्भ करने के पूर्व न तो आगंतुक विद्यार्थियों से कुछ माँगता और न उनके बिना किसी विद्यार्थी को अपने द्वार से लौटाता ही था। धनी और गरीब सभी योग्य विद्यार्थियों के लिए गुरुकुलों के द्वार खुले रहते थे। उनके भीतर का जीवन सादा, श्रद्धापूर्ण, भक्तिपरक और त्यागमय होता था। शिष्य गुरु का अंतेवासी होकर (पास रहकर) उसके व्यक्तित्व और आचरण से सीखता। गुरु और शिष्य के आपसी व्यवहारों की एक संहिता होती और उसका पूर्णत: पालन किया जाता। गुरुकुलों में तब तक जाने हुए सभी प्रकार के शास्त्र और विज्ञान पढ़ाए जाते और शिक्षा पूर्ण हो जाने पर गुरु शिष्य की परीक्षा लेता, दीक्षा देता और समावर्तन संस्कार संपन्न कर उसे अपने परिवार को भेजता। शिष्यगण चलते समय अपनी शक्ति के अनुसार गुरु को दक्षिणा देते, किंतु गरीब विद्यार्थी उससे मुक्त भी कर दिए जाते थे।

 

प्राचीन भारतीय काल में अध्ययन अध्यापन के प्रधान केंद्र गुरुकुल हुआ करते थे, जहाँ दूर-दूर से ब्रह्मचारी विद्यार्थी, अथवा सत्यान्वेषी परिव्राजक अपनी अपनी शिक्षाओं को पूर्ण करने जाते थे। वे गुरुकुल छोटे अथवा बड़े सभी प्रकार के होते थे। परंतु उन सभी गुरुकुलों को न तो आधुनिक शब्दावली में विश्वविद्यालय ही कहा जा सकता है और न उन सबके प्रधान गुरुओं को कुलपति ही कहा जाता था। स्मृतिवचनों के अनुसार स्पष्ट है, जो ब्राह्मण ऋषि दस हजार मुनि विद्यार्थियों को अन्नादि द्वारा पोषण करता हुआ उन्हें विद्या पढ़ाता था, उसे ही कुलपति कहते थे। ऊपर उद्धृत 'स्मृतः' शब्द के प्रयोग से यह साफ दिखाई देता है कि कुलपति के इस विशिष्टार्थग्रहण की परम्परा बड़ी पुरानी थी। कुलपति का साधारण अर्थ किसी कुल का स्वामी होता था। वह कुल या तो एक छोटा और अविभक्त परिवार हो सकता था अथवा एक बड़ा और कई छोटे-छोटे परिवारों का समान उद्गम वंशकुल भी। अंतेवासी विद्यार्थी कुलपति के महान विद्यापरिवार का सदस्य होता था और उसके मानसिक और बौद्धिक विकास का उत्तरदायित्व कुलपति पर होता था; वह छात्रों के शारीरिक स्वास्थ्य और सुख की भी चिंता करता था। आजकल इस शब्द का प्रयोग विश्वविद्यालय के 'वाइसचांसलर' के लिए किया जाता है।

 

गुरुकुल शिक्षा प्रणाली की विशेषताएं  :- गुरुकुल में छात्रों को विभिन्न विषय पढ़ाए जाते थे जो अनुभवात्मक और व्यावहारिक दृष्टिकोण पर आधारित होते थे। इसमें खगोल विज्ञान, दर्शनशास्त्र, राजनीति विज्ञान, योग, अर्थशास्त्र, शारीरिक शिक्षा और रक्षा जैसे विषय शामिल थे। गुरुकुल शिक्षा प्रणाली की कुछ प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार थीं:

गुरुकुल शिक्षा प्रणाली विद्यार्थी को नौकरी के लिए ही नहीं, बल्कि जीवन का सामना करने के लिए भी तैयार करती है।

विद्यार्थियों को मूल्य आधारित प्रयोगात्मक शिक्षा प्रदान की गई।

चरित्र गुणों और समग्र सर्वांगीण विकास को प्रोत्साहित किया गया।

शिक्षा व्यावहारिक आधार पर थी और विद्यार्थियों को भाषा, योग, वेद, आयुर्वेद, इतिहास और राजनीति, व्यावसायिक प्रशिक्षण, आत्मरक्षा, सैन्य युद्ध आदि जैसे अनेक विषय पढ़ाये जाते थे।

यद्यपि शिक्षण पद्धति छात्र-केंद्रित थी, फिर भी छात्रों का मूल्यांकन क्रेडिट प्रणाली के आधार पर किया जाता था, जिसे हम आज क्रेडिट प्रणाली कहते हैं।

उस समय, छात्रों को गुरुकुल छोड़ने की अनुमति तब तक नहीं दी जाती थी जब तक कि गुरु द्वारा निर्देश और निर्णय न लिया जाए, अर्थात, गुरु यह निर्णय लेता था कि क्या छात्र ने पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया है और गुरुकुल छोड़ने के लिए तैयार है।

 

 

आधुनिक काल के गुरुकुल  :-  आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली में गुरुकुल की कई अवधारणाएँ अपनाई गई हैं। जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, अनुभव-आधारित शिक्षा, छात्र-केंद्रित शिक्षा और ऐसी कई अन्य अवधारणाएँ भारत में गुरुकुल की प्राचीन वैदिक शिक्षा प्रणालियों से ली गई हैं। इस प्रकार, जिन अवधारणाओं और उद्देश्यों के आधार पर गुरुकुल काम करते थे, उन्हें आज शिक्षा प्रणाली में पुनर्जीवित और आत्मसात किया जा रहा है।अच्छी बात यह है कि भारत में समग्र शिक्षा प्रदान करने वाले कई गुरुकुल अभी भी मौजूद हैं। उन्हें या तो स्वतंत्रता के बाद पुनर्निर्मित किया गया या स्थापित किया गया, जो व्यावहारिक ज्ञान, आध्यात्मिक शिक्षाओं और समग्र विकास को एकीकृत करने की परंपरा को जारी रखते हैं।

 

उन्नीसवीं शताब्दी में प्रारंभ होने वाले भारतीय राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के युग में प्राचीन गुरुकुलों की परम्परा पर अनेक गुरुकुल स्थापित किए गए। राष्ट्रभावना के प्रसार में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। भारत में लगभग 3000 से अधिक गुरुकुल अभी भी कार्यरत हैं, ये गुरुकुल भारत के विभिन्न राज्यों में स्थित हैं।

 

भारत में राज्यवार गुरुकुलों की सूची  :-

राज्य

गुरुकुल की संख्या

आंध्र प्रदेश

31

असम

1

बिहार

2

छत्तीसगढ़

1

दिल्ली

6

गोवा

4

गुजरात

17

हरियाणा

26

हिमाचल प्रदेश

2

जम्मू और कश्मीर

2

झारखंड

1

कर्नाटक

50

केरल

11

मध्य प्रदेश

8

महाराष्ट्र

46

ओडिशा

13

पंजाब

4

राजस्थान

11

सिक्किम

3

तमिलनाडु

50

तेलंगाना

13

त्रिपुरा

1

उत्तर प्रदेश

22

उत्तराखंड

5

पश्चिम बंगाल

5

 

 

भारत में सर्वश्रेष्ठ गुरुकुल  :-

भारत के कुछ प्रसिद्ध वैदिक गुरुकुल नीचे सूचीबद्ध हैं:

 

  • - गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर, हरिद्वार
  • - परमार्थ निकेतन आश्रम, ऋषिकेश
  • - गुरुकुल पौंधा, देहरादून
  • - दर्शन योग महाविद्यालय, हरियाणा
  • - गुरुकुल झज्जर, हरियाणा
  • - श्री श्रृंगेरी शारदापीठ वेद पाठशाला, हरियाणा
  • - गुरुकुल किशनगढ़-घासेड़ा, हरियाणा
  • - सिद्धगिरि गुरुकुलम, कोल्हापुर
  • - वेद पाठशाला, महर्षि वेद व्यास प्रतिष्ठान, पुणे
  • - श्री शारदापीठ विद्यासभा श्री शंकराचार्य अभिनव सच्चिदानंद तीर्थ वेद विद्यालय, जामनगर
  • - अर्शा विद्या गुरुकुलम अनाइकट्टी, कोयंबटूर
  • - श्री सीतारामदास ओंकारनाथ संस्कृत शिक्षा संसद, कोलकाता
  • - गुरुकुल दधीकर, अलवर
  • - श्री गुरु विरजानन्द गुरुकुल, झालंधर
  • - वेदव्यास आश्रम गुरुकुल, राउरकेला
  • - विष्णुगुप्त विश्व विद्यापीठम, कर्नाटक
  • - महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान, उज्जैन
  • - गुरुकुल आवास मूरंग, ग्रामांग, हिमाचल प्रदेश

 

 आज के समय में भी गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के सफलता के कारण :—

 

  • - गुरुकुलों में शिक्षार्थी की दिनचर्या ही ऐसी होती है कि उसकी लौकिक शिक्षा के साथ साथ सेवा-साधना भी सहज ही हो जाती है। जिससे विद्यार्थियों का मानसिक व बौद्धिक विकास भी बढ़ जाता है।

 

  • - गुरुकुलों का प्राकृतिक वातावरण (प्रकृति के शांत निर्मल व सौरम्य वातावरण) का होना भी सफलता का एक कारण है।

 

  • - गुरुकुलों में शुद्ध व सात्विक भोजन प्रसाद के रूप में और उचित समय पर ग्रहण किया जाता है। हमारे बुजुर्ग लोगों द्वारा एक मुहावरा चरितार्थ था :- "जैसा खाओ अन्न, वैसा होगा मन"।

 

  •  - नित्य त्रिकाल संध्या, जो कि प्रायः आज भूल ही चुके हैं। त्रिकाल संध्या करने से हमारी प्राण शक्ति हमेशा ऊपर के केन्द्रों में रहती है।

 

  • - आज के गुरुकुलों में केरियर निर्माण के लिए व प्रतिस्पर्धाओं के लिए आधुनिक शिक्षा प्रणाली को भी शामिल किया जा रहा है।

 

निष्कर्ष  :-  स्पष्ट रूप से, गुरुकुल स्कूल एक बच्चे के लिए सबसे अच्छा है क्योंकि यह समग्र रूप से विकसित होता है। यह मजबूत दृष्टिकोण, चरित्र और व्यक्तित्व वाले व्यक्तियों का निर्माण करता है। गुरुकुल के विद्यार्थी अधिक अनुशासित और संगठित होते हैं। गुरुकुल में छात्रों को जाति, पंथ, नस्ल, संस्कृति, धर्म और दृष्टिकोण से परे सभी का सम्मान करना सिखाया जाता है। विद्यार्थियों को 'सादा जीवन और उच्च विचार' के सिद्धांत का पालन करना सिखाया जाता है जो जीवन के लिए एक महान सबक है।