सत्यनारायण शब्द का अर्थ :-  सत्यनारायण एक संस्कृत शब्द है जो सत्य और नारायण शब्दों से मिलकर बना है । सत्यनारायण का अर्थ है सत्याचरण, सत्याग्रह, सत्यनिष्ठा। भगवान कृष्ण ; सत्=परम वास्तविकता, नारायण=चेतना में विश्राम करते हुए। भगवान विष्णु के एक रूप का प्रतिनिधित्व करने वाले एक विशेष देवता का नाम ,भगवान सत्यनारायण को भगवान विष्णु का ही रूप माना गया है। सत्यनारायण की पूजा का अर्थ है सत्य की नारायण के रूप में पूजा करना। सत्यनारायण भगवान विष्णु के सत्य गुण का रूप है । नारायण यानि विष्णु को ही इस ब्रहमांड का सत्य माना गया है , उनके अलावा सब माया है | जो व्यक्ति सच्च पर जीवन जीता है उन्हें सत्यनारायण की कृपा प्राप्त होती है ।

 

परिचय :- सत्यनारायण पूजा हिंदू भगवान विष्णु  को समर्पित एक पूजा (धार्मिक अनुष्ठान पूजा) है , जिन्हें सत्यनारायण के नाम से भी जाना जाता है । सत्य को नारायण (विष्णु जी) के रूप में पूजना ही सत्यनारायण भगवान की पूजा है। इसका दूसरा अर्थ यह है कि संसार में एकमात्र भगवान नारायण ही सत्य हैं, बाकी सब माया है  पूजा सत्यनारायण कथा (कहानी) का वर्णन करती है, जो पूजा करने वालों को मिलने वाले विभिन्न सांसारिक और आध्यात्मिक लाभों को बताती है। कथा बताती है कि कैसे देवता नारायण हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान के चार युगों में से अंतिम कलियुग के दौरान अपने भक्तों की सहायता करने की प्रतिज्ञा करते हैं , विशेष रूप से सत्यनारायण पूजा करने वालों और उपस्थित लोगों की। कथा बताती है कि पूजा का प्रदर्शन अपने आप में भगवान से किया गया वादा है , और उन पात्रों की दुर्दशा का वर्णन करती है जो या तो पूजा पूरी करने में विफल रहते हैं या अपने वादों को भूल जाते हैं। सत्यनारायण पूजा का वर्णन स्कंद पुराण में किया गया है , जो मध्यकालीन युग का संस्कृत ग्रंथ है। माधुरी यदलापति के अनुसार, सत्यनारायण पूजा इस बात का एक आदर्श उदाहरण है कि कैसे "हिंदू पूजा भक्ति पूजा की अंतरंगता को सुगम बनाती है जबकि एक बड़ी पवित्र दुनिया में कृतज्ञतापूर्वक भाग लेने की विनम्र भावना को सक्षम बनाती है।"

 

सत्यनारायण पूजा का महत्व :- भगवान सत्यनारायण भगवान विष्णु के सबसे अधिक पूजे जाने वाले रूपों में से एक हैं, जो हर जगह हिंदू धर्म द्वारा व्यापक रूप से पूजनीय हैं। हर महीने, लाखों से अधिक भक्त इस विशेष व्रत का पालन करते हैं और प्रसिद्ध सत्यनारायण कथा और अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। यह भगवान विष्णु का एक रूप है जिसे सभी विष्णु विश्वासियों और भक्तों के बीच लोकप्रिय, विश्वास और सच्चाई के अवतार के रूप में पूजा जाता है। इसके कई लाभ हैं, जिन्होंने कई तरीकों से उपासकों के जीवन को प्रभावित किया है। भगवान सत्यनारायण पर दृढ़ विश्वास रखने वाले लोग इस अनुष्ठान को एक वर्ष में कई बार करते हैं। पूजा भगवान गणेश की प्रार्थना के साथ शुरू होती है, जो जीवन की सभी बाधाओं और बाधाओं को दूर करती है। यह भगवान गणेश के नामों का जप और प्रसाद के साथ कुछ अनुष्ठान जैसे मोदक (भगवान गणेश का पसंदीदा माना जाता है) और फूल की पंखुड़ियों से मूर्ति की पूजा करके किया जाता है। आमतौर पर, यह पूजा पुरुषों और महिलाओं द्वारा की जाती है, न कि पुजारियों द्वारा।

भगवान की पूजा कई रूपों में की जाती है, उनमें से भगवान का सत्यनारायण स्वरूप इस कथा में बताया गया है। इसके मूल पाठ में पाठान्तर से लगभग 170 श्लोक संस्कृत भाषा में उपलब्ध है जो पाँच अध्यायों में बँटे हुए हैं। इस कथा के दो प्रमुख विषय हैं- जिनमें एक है संकल्प को भूलना और दूसरा है प्रसाद का अपमान। व्रत कथा के अलग-अलग अध्यायों में छोटी कहानियों के माध्यम से बताया गया है कि सत्य का पालन न करने पर किस प्रकार की समस्या आती है। इसलिए जीवन में सत्य व्रत का पालन पूरी निष्ठा और सुदृढ़ता के साथ करना चाहिए। ऐसा न करने पर भगवान न केवल नाराज होते हैं अपितु दण्ड स्वरूप सम्पत्ति और बन्धु बान्धवों के सुख से वंचित भी कर देते हैं। इस अर्थ में यह कथा लोक में सच्चाई की प्रतिष्ठा का लोकप्रिय और सर्वमान्य धार्मिक साहित्य हैं। प्रायः पूर्णमासी को इस कथा का परिवार में वाचन किया जाता है। अन्य पर्वों पर भी इस कथा को विधि विधान से करने का निर्देश दिया गया है।इनकी पूजा में केले के पत्ते व फल के अतिरिक्त पंचामृत, पंचगव्य, सुपारी, पान, तिल, मोली, रोली, कुमकुम, दूर्वा की आवश्यकता होती है जिनसे भगवान की पूजा होती है। सत्यनारायण की पूजा के लिए दूध, मधु, केला, गंगाजल, तुलसी पत्ता, मेवा मिलाकर पंचामृत बनाया जाता है जो भगवान को अत्यंत प्रिय है। इन्हें प्रसाद के रूप में फल, मिष्टान्न के अतिरिक्त आटे को भून कर उसमें चीनी मिलाकर एक प्रसाद बनता है जिसे पँजीरी कहा जाता है, उसका भी भोग लगता है।

 

सत्यनारायण पूजा की प्रक्रिया :- सत्यनारायण पूजा भगवान गणेश को प्रार्थना अर्पित करने से शुरू होती है ताकि यदि पूजा गलत तरीके से की जाती है तो सभी बाधाएं सफलतापूर्वक दूर हो सकती हैं। यह भगवान गणेश के विभिन्न नामों का जाप करके और उन्हें प्रसाद (भगवान को परोसी जाने वाली खाद्य सामग्री ) की पेशकश करके प्राप्त किया जा सकता है। भगवान गणेश को मोदक का भोग लगाया जाता है, जो नारियल और चीनी का मिश्रण होता है, या उन्हें लड्डू भी चढ़ाए जा सकते हैं। फूल की पंखुड़ियों से भगवान को स्नान कराना अंतिम प्रक्रिया है।

इस प्रार्थना के एक अन्य महत्वपूर्ण भाग में नवग्रह की प्रार्थना शामिल है - या इस ब्रह्मांड के नौ महत्वपूर्ण खगोलीय प्राणी हैं, उनमें निम्नलिखित नाम शामिल हैं:

  1. सूर्य
  2. चंद्रमा
  3. अंगारक या मंगल
  4. बुद्ध या बुध
  5. बृहस्पति
  6. सूका या शुक्र
  7. शनि
  8. राहु या स्वार्भानु का प्रमुख
  9. केतु या स्वार्भानु की पूंछ

शेष अनुष्ठानों में भगवान विष्णु के सबसे दयालु रूपों में से एक सत्यनारायण की पूजा और प्रार्थना की जाती है। पहला कदम उस स्थान को साफ करना है जहां देवता को रखा जाना है। एक बार देवता को सही स्थिति में रखने के बाद, सत्यनारायण स्वामी की पूजा की जा सकती है। भगवान सत्यनारायण के नामों का जाप विभिन्न प्रसाद के साथ किया जा सकता है जैसे प्रसाद, फल, मिठाई आदि के रूप में।

इस पूजा के लिए एक और महत्वपूर्ण आवश्यकता सत्यनारायण की कहानी है, जिसे इस पूजा में भाग लेने वाले सभी भक्तों द्वारा सुना जाना है।

पूजा का समापन आरती के साथ किया जाता है, जिसमें भगवान सत्यनारायण की छवि के निकटवर्ती क्षेत्र में अग्नि प्रज्जवलित दीप की परिक्रमा की जाती है। एक बार पूजा समाप्त हो जाने के बाद, इस पूजा के पर्यवेक्षकों और प्रतिभागियों को प्रभु को चढ़ाए गए प्रसाद को ग्रहण करना और आशीर्वाद लेना चाहिए।

 

श्री सत्यनारायण व्रत एवं कथा :-

सत्यनारायण व्रत कथा का पहला अध्याय :-
एक समय की बात है नैषिरण्य तीर्थ में शौनिकादि, 88,000 ऋषियों ने श्री सूतजी से पूछा हे प्रभु! इस कलियुग में वेद विद्या रहित मनुष्यों को प्रभु भक्ति किस प्रकार मिल सकती है? तथा उनका उद्धार कैसे होगा? हे मुनि श्रेष्ठ ! कोई ऐसा तप बताइए जिससे थोड़े समय में ही पुण्य मिलें और मनवांछित फल भी मिल जाए। इस प्रकार की कथा सुनने की हम इच्छा रखते हैं। सर्व शास्त्रों के ज्ञाता सूतजी बोले: हे वैष्णवों में पूज्य ! आप सभी ने प्राणियों के हित की बात पूछी है इसलिए मैं एक ऐसे श्रेष्ठ व्रत को आप लोगों को बताऊंगा जिसे नारद जी ने लक्ष्मीनारायण जी से पूछा था और लक्ष्मीपति ने मनिश्रेष्ठ नारद जी से कहा था। आप सब इसे ध्यान से सुनिए |

एक समय की बात है, योगीराज नारदजी दूसरों के हित की इच्छा लिए अनेकों लोको में घूमते हुए मृत्युलोक में आ पहुंचे। यहां उन्होंने अनेक योनियों में जन्मे प्राय: सभी मनुष्यों को अपने कर्मों द्वारा अनेकों दुखों से पीड़ित देखा। उनका दुख देख नारदजी सोचने लगे कि कैसा यत्न किया जाए जिसके करने से निश्चित रुप से मानव के दुखों का अंत हो जाए। इसी विचार पर मनन करते हुए वह विष्णुलोक में गए। वहाँ वह देवों के ईश नारायण की स्तुति करने लगे जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे, गले में वरमाला पहने हुए थे। स्तुति करते हुए नारद जी बोले, हे भगवान! आप अत्यंत शक्ति से संपन्न हैं, मन तथा वाणी भी आपको नहीं पा सकती हैं। आपका आदि, मध्य तथा अंत नहीं है। निर्गुण स्वरुप सृष्टि के कारण भक्तों के दुख को दूर करने वाले है, आपको मेरा नमस्कार है। नारदजी की स्तुति सुन विष्णु भगवान बोले, हे मुनिश्रेष्ठ! आपके मन में क्या बात है? आप किस काम के लिए पधारे हैं? उसे नि:संकोच कहो। इस पर नारद मुनि बोले कि मृत्युलोक में अनेक योनियों में जन्मे मनुष्य अपने कर्मों के द्वारा अनेको दुख से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! आप मुझ पर दया रखते हैं तो बताइए कि वो मनुष्य थोड़े प्रयास से ही अपने दुखों से कैसे छुटकारा पा सकते है

      श्रीहरि बोले, हे नारद! मनुष्यों की भलाई के लिए तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिसके करने से मनुष्य मोह से छूट जाता है, वह बात मैं कहता हूं, उसे सुनो। स्वर्ग लोक व मृत्युलोक दोनों में एक दुर्लभ उत्तम व्रत है जो पुण्य देने वाला है। आज प्रेमवश होकर मैं उसे तुमसे कहता हूं। श्रीसत्यनारायण भगवान का यह व्रत अच्छी तरह विधानपूर्वक करके मनुष्य तुरंत ही यहाँ सुख भोग कर, मरने पर मोक्ष पाता है। श्रीहरि के वचन सुन नारदजी बोले कि उस व्रत का फल क्या है? और उसका विधान क्या है? यह व्रत किसने किया था? इस व्रत को किस दिन करना चाहिए? सभी कुछ विस्तार से बताएं। नारद की बात सुनकर श्रीहरि बोले, दुख व शोक को दूर करने वाला यह सभी स्थानों पर विजय दिलाने वाला है। मानव को भक्ति व श्रद्धा के साथ शाम को श्रीसत्यनारायण की पूजा धर्म परायण होकर ब्राह्मणों व बंधुओं के साथ करनी चाहिए। भक्ति भाव से ही नैवेद्य, केले का फल, घी, दूध और गेहूँ का आटा सवाया लें। गेहूं के स्थान पर साठी का आटा, शक्कर तथा गुड़ लेकर व सभी भक्षण योग्य पदार्थो को मिलाकर भगवान का भोग लगाएँ। ब्राह्मणों सहित बंधु-बांधवों को भी भोजन कराएं, उसके बाद स्वयं भोजन करें। भजन, कीर्तन के साथ भगवान की भक्ति में लीन हो जाएं। इस तरह से सत्य नारायण भगवान का यह व्रत करने पर मनुष्य की सारी इच्छाएँ निश्चित रुप से पूरी होती हैं। इस कलि काल अर्थात कलियुग में मृत्युलोक में मोक्ष का यही एक सरल उपाय बताया गया है।

 

सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा का दूसरा अध्याय  :-

सूत जी बोले, हे ऋषियों ! जिसने पहले समय में इस व्रत को किया था उसका इतिहास कहता हूं, ध्यान से सुनो! सुंदर काशीपुरी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख प्यास से परेशान वह धरती पर घूमता रहता था। ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले भगवान ने एक दिन ब्राह्मण का वेश धारण कर उसके पास जाकर पूछा: हे विप्र! नित्य दुखी होकर तुम पृथ्वी पर क्यूों घूमते हो? दीन ब्राह्मण बोला, मैं निर्धन ब्राह्मण हूं। भिक्षा के लिए धरती पर घूमता हूं। हे भगवान! यदि आप इसका कोई उपाय जानते हो तो बताइए। वृद्ध ब्राह्मण कहता है कि सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल देने वाले हैं इसलिए तुम उनका पूजन करो। इसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।

वृद्ध ब्राह्मण बनकर आए सत्यनारायण भगवान उस निर्धन ब्राह्मण को व्रत का सारा विधान बताकर अन्तर्धान हो गए। ब्राह्मण मन ही मन सोचने लगा कि जिस व्रत को वृद्ध ब्राह्मण करने को कह गया है मैं उसे जरुर करूंगा। यह निश्चय करने के बाद उसे रात में नींद नहीं आई। वह सवेरे उठकर सत्यनारायण भगवान के व्रत का निश्चय कर भिक्षा के लिए चला गया। उस दिन निर्धन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत धन मिला। जिससे उसने बंधु-बांधवों के साथ मिलकर श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत संपन्न किया। भगवान सत्यनारायण का व्रत संपन्न करने के बाद वह निर्धन ब्राह्मण सभी दुखों से छूट गया और अनेक प्रकार की संपत्तियों से युक्त हो गया। उसी समय से यह ब्राह्मण हर माह इस व्रत को करने लगा। इस तरह से सत्यनारायण भगवान के व्रत को जो मनुष्य करेगा वह सभी प्रकार के पापों से छूटकर मोक्ष को प्राप्त होगा। जो मनुष्य इस व्रत को करेगा वह भी सभी दुखों से मुक्त हो जाएगा। सूतजी बोले कि इस तरह से नारद जी से नारायण जी का कहा हुआ श्रीसत्यनारायण व्रत को मैने तुमसे कहा। हे विप्रो ! मैं अब और क्या कहूँ? ऋषि बोले, हे मुनिवर ! संसार में उस विप्र से सुनकर और किस-किस ने इस व्रत को किया, हम सब इस बात को सुनना चाहते हैं। इसके लिए हमारे मन में श्रद्धा का भाव है।

 सूतजी बोले, हे मुनियों! जिस-जिस ने इस व्रत को किया है, वे सब सुनो ! एक समय वही विप्र धन व ऐश्वर्य के अनुसार अपने बंधु-बांधवों के साथ इस व्रत को करने को तैयार हुआ। उसी समय एक लकड़ी बेचने वाला बूढ़ा आदमी आया और लकड़ियां बाहर रखकर अंदर ब्राह्मण के घर में गया। प्यास से दुखी वह लकड़हारा उनको व्रत करते देख विप्र को नमस्कार कर पूछने लगा कि आप यह क्या कर रहे है तो उन्होंने बताया कि व्रत कर रहा हूं। तथा इसे करने से क्या फल मिलेगा? कृपया मुझे भी बताएं। ब्राह्मण ने कहा कि सब मनोकामनाओं को पूरा करने वाला यह सत्यनारायण भगवान का व्रत है। इनकी कृपा से ही मेरे घर में धन धान्य आदि की वृद्धि हुई है। विप्र से सत्यनारायण व्रत या के बारे में जानकर लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ। चरणामृत लेकर व प्रसाद खाने के बाद वह अपने घर गया। लकड़हारे ने अपने मन में संकल्प किया कि आज लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा उसी से श्रीसत्यनारायण भगवान का उत्तम व्रत करूंगा। मन में इस विचार को ले बूढ़ा आदमी सिर पर लकड़ियां रख उस नगर में बेचने गया जहां धनी लोग ज्यादा रहते थे। उस नगर में उसे अपनी लकड़ियों का दाम पहले से चार गुना अधिक मिलता है। बूढ़ा प्रसन्नता के साथ दाम लेकर केले, शक्कर, घी, दूध, दही और गेहूं का आटा ले और सत्यनारायण भगवान के व्रत की अन्य सामग्रियां लेकर अपने घर गया। वहां उसने अपने बंधु-बांधवों को बुलाकर विधि विधान से सत्यनारायण भगवान का पूजन और व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन पुत्र आदि से युक्त होकर संसार के समस्त सुख भोग अंत काल में बैकुंठ धाम चला गया।

 

सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा का तीसरा अध्याय :-
सूतजी बोले, हे श्रेष्ठ मुनियों, अब आगे की कथा कहता हूं। पहले समय में उल्कामुख नाम का एक बुद्धिमान राजा था। वह सत्यवक्ता और जितेन्द्रिय था। प्रतिदिन देव स्थानों पर जाता और निर्धनों को धन देकर उनके कष्ट दूर करता था। उसकी पत्नी कमल के समान मुख वाली तथा सती साध्वी थी। भद्रशीला नदी के तट पर उन दोनो ने श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत किया। उसी समय साधु नाम का एक वैश्य आया। उसके पास व्यापार करने के लिए बहुत सा धन भी था। राजा को व्रत करते देखकर वह विनय के साथ पूछने लगा, हे राजन ! भक्तिभाव से पूर्ण होकर आप यह क्या कर रहे हैं? मैं सुनने की इच्छा रखता हूँ तो आप मुझे बताएं। राजा बोला, हे साधु! अपने बंधु-बांधवों के साथ पुत्रादि की प्राप्ति के लिए एक महाशक्तिमान श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत व पूजन कर रहा हूं। राजा के वचन सुन साधु आदर से बोला, हे राजन! मुझे इस व्रत का सारा विधान कहिए। आपके कथनानुसार मैं भी इस व्रत को करुँगा। मेरी भी संतान नहीं है और इस व्रत को करने से निश्चित रुप से मुझे संतान की प्राप्ति होगी। राजा से व्रत का सारा विधान सुन, व्यापार से निवृत हो वह अपने घर गया। साधु वैश्य ने अपनी पत्नी को संतान देने वाले इस व्रत का वर्णन कह सुनाया और कहा कि जब मेरी संतान होगी तब मैं इस व्रत को करुंगा। साधु ने इस तरह के वचन अपनी पत्नी लीलावती से कहे। एक दिन लीलावती पति के साथ आनन्दित हो सांसारिक धर्म में प्रवृत होकर सत्यनारायण भगवान की कृपा से गर्भवती हो गई। दसवें महीने में उसके गर्भ से एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया। दिनों दिन वह ऐसे बढ़ने लगी जैसे कि शुक्ल पक्ष का चंद्रमा बढ़ता है। माता-पिता ने अपनी कन्या का नाम कलावती रखा। एक दिन लीलावती ने मीठे शब्दों में अपने पति को याद दिलाया कि आपने सत्यनारायण भगवान के जिस व्रत को करने का संकल्प किया था उसे करने का समय आ गया है, आप इस व्रत को करिये। साधु बोला कि हे प्रिये! इस व्रत को मैं उसके विवाह पर करुँगा। इस प्रकार अपनी पत्नी को आश्वासन देकर वह नगर को चला गया। कलावती पिता के घर में रह वृद्धि को प्राप्त हो गई।

साधु ने एक बार नगर में अपनी कन्या को सखियों के साथ देखा तो तुरंत ही दूत को बुलाया और कहा कि मेरी कन्या के योग्य वर देख कर आओ। साधु की बात सुनकर दूत कंचन नगर में पहुंचा और वहाँ देखभाल कर लड़की के सुयोग्य वाणिक पुत्र को ले आया। सुयोग्य लड़के को देख साधु ने बंधु-बांधवों को बुलाकर अपनी पुत्री का विवाह कर दिया लेकिन दुर्भाग्य की बात ये कि साधु ने अभी भी श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत नहीं किया। इस पर श्री भगवान क्रोधित हो गए और श्राप दिया कि साधु को अत्यधिक दुख मिले। अपने कार्य में कुशल साधु बनिया जमाई को लेकर समुद्र के पास स्थित होकर रत्नासारपुर नगर में गया। वहां जाकर दामाद-ससुर दोनों मिलकर चन्द्रकेतु राजा के नगर में व्यापार करने लगे। एक दिन भगवान सत्यनारायण की माया से एक चोर राजा का धन चुराकर भाग रहा था। उसने राजा के सिपाहियों को अपना पीछा करते देख चुराया हुआ धन वहां रख दिया जहां साधु अपने जमाई के साथ ठहरा हुआ था। राजा के सिपाहियों ने साधु वैश्य के पास राजा का धन पड़ा देखा तो वह ससुर-जमाई दोनों को बांधकर प्रसन्नता से राजा के पास ले गए और कहा कि उन दोनों चोरों हम पकड़ लाएं हैं, आप आगे की कार्यवाही की आज्ञा दें।

राजा की आज्ञा से उन दोनों को कठिन कारावास में डाल दिया गया और उनका सारा धन भी उनसे छीन लिया गया। श्रीसत्यनारायण भगवान से श्राप से साधु की पत्नी भी बहुत दुखी हुई। घर में जो धन रखा था उसे चोर चुरा ले गए। शारीरिक तथा मानसिक पीड़ा व भूख प्यास से अति दुखी हो अन्न की चिन्ता में कलावती के ब्राह्मण के घर गई। वहां उसने श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा फिर कथा भी सुनी वह प्रसाद ग्रहण कर वह रात को घर वापिस आई। माता के कलावती से पूछा कि हे पुत्री अब तक तुम कहां थी? तेरे मन में क्या है? कलावती ने अपनी माता से कहा, हे माता ! मैंने एक ब्राह्मण के घर में श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत देखा है। कन्या के वचन सुन लीलावती भगवान के पूजन की तैयारी करने लगी। लीलावती ने परिवार व बंधुओं सहित सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और उनसे वर मांगा कि मेरे पति तथा जमाई शीघ्र घर आ जाएं। साथ ही यह भी प्रार्थना की कि हम सब का अपराध क्षमा करें। श्रीसत्यनारायण भगवान इस व्रत से संतुष्ट हो गए और राजा चन्द्रकेतु को सपने में दर्शन दे कहा कि: हे राजन! तुम उन दोनो वैश्यों को छोड़ दो और तुमने उनका जो धन लिया है उसे वापस कर दो। अगर ऐसा नहीं किया तो मैं तुम्हारा धन राज्य व संतान सभी को नष्ट कर दूंगा। राजा को यह सब कहकर वह अन्तर्धान हो गए।

प्रात:काल सभा में राजा ने अपना सपना सुनाया फिर बोले कि बणिक पुत्रों को कैद से मुक्त कर सभा में लाओ। दोनो ने आते ही राजा को प्रणाम किया। राजा मीठी वाणी में बोला, हे महानुभावों ! भाग्यवश ऎसा कठिन दुख तुम्हें प्राप्त हुआ है लेकिन अब तुम्हें कोई भय नहीं है। ऎसा कह राजा ने उन दोनों को नए वस्त्राभूषण भी पहनाए और जितना धन उनका लिया था उससे दुगुना धन वापिस कर दिया। दोनो वैश्य अपने घर को चल दिए।

 

सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा का चौथा अध्याय :-
सूतजी बोले, वैश्य ने मंगलाचार कर अपनी यात्रा आरंभ की और अपने नगर की ओर चल दिए। उनके थोड़ी दूर जाने पर एक दण्डी वेशधारी श्रीसत्यनारायण ने उनसे पूछा, हे साधु तेरी नाव में क्या है? अभिवाणी वणिक हंसता हुआ बोला: हे दण्डी ! आप क्यों पूछते हो? क्या धन लेने की इच्छा है? मेरी नाव में तो बेल व पत्ते भरे हुए हैं। वैश्य के कठोर वचन सुन भगवान बोले: तुम्हारा वचन सत्य हो! दण्डी ऐसे वचन कह वहां से दूर चले गए। कुछ दूर जाकर समुद्र के किनारे बैठ गए। दण्डी के जाने के बाद साधु वैश्य ने नित्य क्रिया के पश्चात नाव को ऊंची उठते देखकर अचंभा माना और नाव में बेल-पत्ते आदि देख वह मूर्छित हो जमीन पर गिर पड़ा। मूर्छा खुलने पर वह अत्यंत शोक में डूब गया तब उसका दामाद बोला कि आप शोक ना मनाएँ, यह दण्डी का शाप है इसलिए हमें उनकी शरण में जाना चाहिए तभी हमारी मनोकामना पूरी होगी। दामाद की बात सुनकर वह दण्डी के पास पहुंचा और अत्यंत भक्तिभाव नमस्कार कर के बोला, मैंने आपसे जो जो असत्य वचन कहे थे उनके लिए मुझे क्षमा दें, ऐसा कह कहकर महान शोकातुर हो रोने लगा तब दण्डी भगवान बोले, हे वणिक पुत्र ! मेरी आज्ञा से बार-बार तुम्हें दुख प्राप्त हुआ है।

तू मेरी पूजा से विमुख हुआ। साधु बोला, हे भगवान ! आपकी माया से ब्रह्मा आदि देवता भी आपके रूप को नहीं जानते तब मैं अज्ञानी कैसे जान सकता हूँ। आप प्रसन्न होइए, अब मैं सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा करूंगा। मेरी रक्षा करो और पहले के समान नौका में धन भर दो। साधु वैश्य के भक्तिपूर्वक वचन सुनकर भगवान प्रसन्न हो गए और उसकी इच्छानुसार वरदान देकर अन्तर्धान हो गए। ससुर-जमाई जब नाव पर आए तो नाव धन से भरी हुई थी फिर वहीं अपने अन्य साथियों के साथ सत्यनारायण भगवान का पूजन कर अपने नगर को चल दिए। जब नगर के नजदीक पहुंचे तो दूत को घर पर खबर करने के लिए भेज दिया। दूत साधु की पत्नी को प्रणाम कर कहता है कि मालिक अपने दामाद सहित नगर के निकट आ गए हैं। दूत की बात सुन साधु की पत्नी लीलावती ने बड़े हर्ष के साथ सत्यनारायण भगवान का पूजन कर अपनी पुत्री कलावती से कहा कि मैं अपने पति के दर्शन को जाती हूं तू कार्य पूर्ण कर शीघ्र आ जा! माता के ऎसे वचन सुन कलावती जल्दी में प्रसाद छोड़ अपने पति के पास चली गई। प्रसाद की अवज्ञा के कारण श्रीसत्यनारायण भगवान रुष्ट हो गए और नाव सहित उसके पति को पानी में डुबो दिया। कलावती अपने पति को वहाँ ना पाकर रोती हुई जमीन पर गिर गई। नौका को डूबा हुआ देख व कन्या को रोता देख साधु दुखी होकर बोला कि हे प्रभु ! मुझसे तथा मेरे परिवार से जो भूल हुई है उसे क्षमा करें।साधु के दीन वचन सुनकर श्रीसत्यनारायण भगवान प्रसन्न हो गए और आकाशवाणी हुई: हे साधु! तेरी कन्या मेरे प्रसाद को छोड़कर आई है इसलिए उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि वह घर जाकर प्रसाद खाकर लौटती है तो इसे इसका पति अवश्य मिलेगा। ऐसी आकाशवाणी सुन कलावती घर पहुंचकर प्रसाद खाती है और फिर आकर अपने पति के दर्शन करती है। उसके बाद साधु अपने बंधु-बाँधवों सहित श्रीसत्यनारायण भगवान का विधि-विधान से पूजन करता है। इस लोक का सुख भोग वह अंत में स्वर्ग जाता है।

 

सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा का पांचवा अध्याय :-
सूतजी बोले, हे ऋषियों ! मैं और भी एक कथा सुनाता हूं, उसे भी ध्यानपूर्वक सुनो! प्रजापालन में लीन तुंगध्वज नाम का एक राजा था। उसने भी भगवान का प्रसाद त्याग कर बहुत ही दुख सान किया। एक बार वन में जाकर वन्य पशुओं को मारकर वह बड़ के पेड़ के नीचे आया। वहाँ उसने ग्वालों को भक्ति-भाव से अपने बंधुओं सहित सत्यनारायण भगवान का पूजन करते देखा। अभिमानवश राजा ने उन्हें देखकर भी पूजा स्थान में नहीं गया और ना ही उसने भगवान को नमस्कार किया। ग्वालों ने राजा को प्रसाद दिया लेकिन उसने वह प्रसाद नहीं खाया और प्रसाद को वहीं छोड़ वह अपने नगर को चला गया। जब वह नगर में पहुंचा तो वहाँ सबकुछ तहस-नहस हुआ पाया तो वह शीघ्र ही समझ गया कि यह सब भगवान ने ही किया है। वह दुबारा ग्वालों के पास पहुंचा और विधि पूर्वक पूजा कर के प्रसाद खाया तो श्रीसत्यनारायण भगवान की कृपा से सब कुछ पहले जैसा हो गया। दीर्घकाल तक सुख भोगने के बाद मरणोपरांत उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई। जो मनुष्य परम दुर्लभ इस व्रत को करेगा तो भगवान सत्यनारायण की अनुकंपा से उसे धन-धान्य की प्राप्ति होगी। निर्धन धनी हो जाता है और भयमुक्त हो जीवन जीता है। संतान हीन मनुष्य को संतान सुख मिलता है और सारे मनोरथ पूर्ण होने पर मानव अंतकाल में बैकुंठधाम को जाता है। सूतजी बोले, जिन्होंने पहले इस व्रत को किया है अब उनके दूसरे जन्म की कथा कहता हूं। वृद्ध शतानन्द ब्राह्मण ने सुदामा का जन्म लेकर मोक्ष की प्राप्ति की। लकड़हारे ने अगले जन्म में निषाद बनकर मोक्ष प्राप्त किया। उल्कामुख नाम का राजा दशरथ होकर बैकुंठ को गए। साधु नाम के वैश्य ने मोरध्वज बनकर अपने पुत्र को आरे से चीरकर मोक्ष पाया। महाराज तुंगध्वज ने स्वयंभू होकर भगवान में भक्तियुक्त हो कर्म कर मोक्ष पाया।

 

श्री सत्यनारायण पूजा के लाभ :- 

  • घर पर सत्यनारायण पूजा करने से सफलता मिल सकती है। जो लोग इस पूजा को करते हैं वे अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं और अपनी आकांक्षाओं को पूरा कर सकते हैं। यह व्यक्तियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में भी काफी सुधार कर सकता है।
  • यह भक्तों को एक भौतिक जीवन का आनंद लेने में मदद कर सकता है और समग्र पारिवारिक समृद्धि भी बढ़ा सकता है।
  • यह पिछले जन्म के सभी पापों को दूर कर सकता है।

 

सत्यनारायण पूजा की लोकप्रियता :- सत्यनारायण पूजा की व्यापक लोकप्रियता के कई कारण हैं। सबसे पहले, यह हिंदुओं द्वारा किए गए सबसे सरल और आसान अनुष्ठानों में से एक है। दूसरी बात, कोई भी इस पूजा को बिना उम्र या लिंग के कर सकता है। विधवाएँ भी सत्यनारायण व्रत कर सकती हैं। इसलिए, यह साबित होता है कि जब भगवान का संबंध है, तो बाधाएं मौजूद नहीं हैं। इस अनुष्ठान को करते समय केवल विश्वास, ईमानदारी और भक्ति मायने रखती है। एक बार फिर, यह पूजा किसी भी समय और किसी भी दिन की जा सकती है, हालांकि कुछ दिनों को अधिक शुभ माना जाता है, जैसे कि पूर्णिमा और एकादशी। श्री सत्यनारायण पूजा को भारत के विभिन्न हिस्सों में एक पारंपरिक अनुष्ठान माना जाता है, जिसमें बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश शामिल हैं। मराठी लोग इस रस्म को चतुर्थी या एकादशी पर मनाते हैं। महाराष्ट्र में चितपावन समुदाय की पूजा का विशेष महत्व है। पश्चिम बंगाल में, पूजा गृहनिर्माण या नए घर में प्रवेश करने से पहले की जाती है। आंध्र प्रदेश में, लोगों में श्रीमन्नारायण के प्रति दृढ़ विश्वास और विश्वास है, जो कि भगवान विष्णु का अवतार है। आंध्र प्रदेश में पूर्वी गोदावरी जिले के अन्नवरम में एक प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर है, जो श्री सत्यनारायण को समर्पित है और मंदिर में आने वाले हजारों भक्तों को अपनी प्रार्थना करने के लिए गवाह बनाते हैं। यह व्रत अन्नवरम में नियमित रूप से किया जाता है। न केवल भक्त, बल्कि उनके परिवार भी इस मंदिर का दौरा करते हैं और व्रत में भाग लेते हैं, जिसे प्रार्थना की पेशकश करने का सबसे पवित्र तरीका माना जाता है।

 

निष्कर्ष :- इस पूजा को भक्ति और विश्वास के साथ करने के बाद, भक्तों को आम तौर पर बहुत लाभ होता है - उनकी समस्याओं का समाधान होता है और वे जीवन में आने वाली कठिनाइयों पर काबू पा सकते हैं। सत्यनारायण पूजा का उद्देश्य मित्रों और परिवार को एक साथ लाना और एकता और सद्भाव को प्रोत्साहित करना भी है। यह हिंदुओं के बीच एक आम धारणा है कि हमें सार्वभौमिक खुशी और एकता पर ध्यान देना चाहिए। इस प्रकार, इस तरह एक उत्सव दुनिया को एक साथ इकट्ठा करने और प्रार्थना और अनुष्ठान की पेशकश करने के लिए एक अच्छी जगह बना सकता है।

 

“सत्यनारायण पूजन”

सामग्री विवरण

पूजन सामग्री :-

 

 

रोली

10 ग्राम

पीला सिंदूर

10 ग्राम

पीला अष्टगंध चंदन

10 ग्राम

लाल सिंदूर

10 ग्राम

हल्दी (पिसी)

50 ग्राम

हल्दी (समूची)

50 ग्राम

सुपाड़ी (समूची बड़ी)

100 ग्राम

लौंग

10 ग्राम

इलायची

10 ग्राम

सर्वौषधि

1 डिब्बी

सप्तमृत्तिका

1 डिब्बी

पीली सरसों

50 ग्राम

जनेऊ

5 पीस

इत्र

1 शीशी

गरी का गोला (सूखा)

2 पीस

पानी वाला नारियल

1 पीस

जटादार सूखा नारियल

1 पीस

अक्षत (चावल)

1 किलो

धूपबत्ती

1 पैकेट

रुई की बत्ती (गोल / लंबी)

1-1 पैकेट

देशी घी

500 ग्राम

कपूर

20 ग्राम

कलावा

5 पीस

चुनरी (लाल / पीली)

1/1 पीस

बताशा

500 ग्राम

गंगाजल

1 शीशी

नवग्रह चावल

1 पैकेट

लाल वस्त्र

1 मीटर

पीला वस्त्र

1 मीटर

कुश (पवित्री)

4 पीस

लकड़ी की चौकी

1 पीस

दोना (छोटा-बड़ा)

1-1 पीस

मिट्टी का कलश (बड़ा)

1 पीस

मिट्टी का प्याला

8 पीस

मिट्टी की दियाली

8 पीस

हवन कुण्ड

1 पीस

माचिस

1 पीस

आम की लकड़ी

2 किलो

नवग्रह समिधा

1 पैकेट

हवन सामग्री

500 ग्राम

तिल

100 ग्राम

जौ

100 ग्राम

गुड़

100 ग्राम

कमलगट्टा

100 ग्राम

शहद

50 ग्राम

पंचमेवा

200 ग्राम

पंचरत्न व पंचधातु

1 डिब्बी

धोती (पीली/लाल)

1 पीस

अगोंछा (पीला/लाल)

1 पीस

 

                      तत्काल लेने का सामान

सामग्री     

मात्रा

मिष्ठान

500 ग्राम

पान के पत्ते (समूचे)

21 पीस

केले के पत्ते

5 पीस

आम के पत्ते

2 डंठल

ऋतु फल

5 प्रकार के

दूब घास

50 ग्राम

फूल, हार (गुलाब) की

2 माला

फूल, हार (गेंदे) की

2 माला

गुलाब/गेंदा का खुला हुआ फूल

500 ग्राम

तुलसी की पत्ती

5 पीस

दूध

1 लीटर

दही

1 किलो

 

                  देव चित्र (प्रतिमा-मूर्ति)

प्रतिमा – मूर्ति              

 मात्रा

सत्यनारायण भगवान की प्रतिमा

1 पीस

 

                 घर से लेने वाला सामान

सामग्री

 मात्रा

आटा

100 ग्राम

चीनी

500 ग्राम

अखंड दीपक (ढक्कन समेत)

1 पीस

तांबे/पीतल का कलश (ढक्कन समेत)

1 पीस

 

थाली

2 पीस

लोटे

2 पीस

कटोरी

4 पीस

चम्मच

2 पीस

परात

2 पीस

कैंची /चाकू (लड़ी काटने हेतु)

1 पीस

    जल (पूजन हेतु)

    गाय का गोबर

    मिट्टी

    बिछाने का आसन

 

            यजमान की गांठ बांधने हेतु सामग्री

चुनरी

 1 पीस

अंगोछा

 1 पीस

पूजा में रखने हेतु सिंदौरा

 1 पीस

 

                  घर में प्रसाद बनाने हेतु

पंचामृत

पंजीरी

 

                ब्राह्मणो के लिए वरण सामग्री

धोती

कुर्ता

अंगोछा

पंच पात्र

माला इत्यादि

 

प्रसाद बाँटने के लिए दोना व गिलास